तेरी याद...

Wednesday, January 27, 2010



दिन गुज़रे,शाम गुजरी,
शाम के बाद फिर रात गुजरी,
तेरी यादों की महफ़िल से होकर,
तेरी एक-एक बात गुजरी॥
दीवानगी का आलम इस से ज्यादा क्या होगा,
की दिया जलाए बैठे हैं आस का,
आज भी दिल के उसी आँगन में,
जिस आँगन से होकर,
बस तू ही पहली बार गुजरी॥
यूँ तो ज़माने हो गए तुमसे पहली मुलाकात किये,
पर आज भी लगता है की उस पल के बाद,
न तो कभी कोई पल बीता,और न ही वो रात गुजरी॥
तुझसे इज़हार-ए-मोहब्बत मैं कर भी नहीं सकता,
तेरे रुसवा होने का डर है,
तुझे मैं भूल भी नहीं सकता,
मेरे फना होने का डर है,
अब तू ही कुछ इलाज बता इस बीमार-ए-इश्क का,
तेरी आँखों की हया,
तेरी साँसों की खुशबू,
तेरी पायल की छन-छन,
तेरे घुंघरू की खन-खन,
जिसके लिए ऐसे हैं,
जैसे हर बार उसके ऊपर से एक क़यामत गुजरी॥

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