महफ़िल-ए-शेर-ओ-शायरी.....भाग १५

Sunday, June 19, 2011

हम कुछ ऐसे तेरे दीदार में खो जाते हैं
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं

नये कमरों में अब चीजें पुरानी कौन रखता है
परिंदों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सबसे छोटा था मेरी हिस्से में माँ आई

रो रहे थे सब तो मैं भी फूट कर रोने लगा
वरना मुझको बेटियों की रुख़सती अच्छी लगी

एक फकीर ने कुछ इस तरह ज़िन्दगी की मिसाल दी
मुट्ठी में धूल लेकर हवा में उछाल दी !!

देखकर सोचा तो पाया फासला ही फासला
और सोचकर देखा तुम मेरे बहुत करीब थे

तेरे दामन ने सारे शहर को सैलाब से रोका
नहीं तो मेरे से आंसू समुन्दर हो जाये होते

वो जब भी मिलता है अंदाज़ ऐ जुदा होता है
चाँद सौ बार भी निकले तो नया होता है

सूरज , सितारे , चाँद मेरे साथ में रहे
जब तक तुम्हारे हाथ मेरे हाथ में रहे
और शाखों जो टूट जाये वो पत्ते नही है हम
आंधी से कोई कहे दी की औकात में रहे

कौन सी बात, कब ,कैसे कही जाती है
ये सलीका हो तो हर बात सुनी जाती है

मोहब्बत में अब वो पहले वाली बात कहा,
शहर में बस अब, जिस्म बिका करते है.

दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहे
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों ।

किसकी आवाज़ की रिमझिम से ये भीगा है बदन..
"हम तुम्हारे हैं " ये धीरे से कहा हो जैसे

मेरी बेकरारी देखी है ,कभी सब्र भी देख,
मैं इतना खामोश हो जाउंगा तू चिल्ला उठेगा.....

मेरे होठों को दे देना ज़माने भर की तिश्नगी, मगर उसके लबों को इक नदी की कैफियत देना
मैं उसकी आँख के हर खवाब में कुछ रंग भर पाऊँ, मेरे अल्लाह मुझको सिर्फ इतनी हैसियत देना॥

लिखता हूँ तो तुम ही उतरते हो क़लम से..
पढ़ता हूँ तो लहजा भी तुम आवाज़ भी तुम..!

तुझे ख्वाब ही में देखूं ये भरम भी आज टूटा
तेरे ख्वाब कैसे देखूं मुझे नींद ही ना आई...

हर बार तोडा दिल तूने इस क़दर संग-दिल
गर जोड़ता टुकड़े तो ताजमहल बनता

हाँथ मेरा देख कर ये मशवरा उसने दिया..
कुछ लकीरों को मिटाना अब ज़रूरी हो गया ||

1 comments:

AKARSHAN DUBEY said...

Akarshan dubey
9807993663
Bahot achha aalekh ..
Dhanywad