मैं भी Santa Clause...........

Friday, June 10, 2011

"सांता क्लॉस" नाम एक ऐसा नाम है जिससे संपूर्ण विश्व के लगभग सभी लोग परिचित होंगे.क्रिसमस पर सभी लोगों को अगर किसी ख़ास का इंतज़ार सबसे ज्यादा रहता है तो शायद वो सांता क्लॉस ही है.सिर्फ बच्चे ही नहीं,अपितु बड़े भी सांता से गिफ्ट्स पाकर खिल उठते हैं.हर कोई बस यही सोचता है कि काश सांता से अगली मुलाकात के लिए एक साल लम्बा इंतज़ार नहीं करना पड़े.परन्तु ऐसा हो नहीं पाटा क्यूंकि वो सांता तो फिर अगले साल २५ दिसम्बर को ही वापस आता है.

मगर हम क्या कभी यह सोचते हैं कि सांता को हम अपने कार्यों से पूरे साल अपने करीब महसूस कर सकते हैं,बस ज़रुरत है सही कदम उठाने कि.मगर कैसे?शायद मेरे यह कुछ विचार इन सवालों को हल करने में थोड़ी सी मदद करें.

क्यूँ ना हम कुछ ऐसा करें कि सांता क्लॉस कि मूल विचारधारा को अपने व्यक्तिगत जीवन में उतार कर कुछ क्रांतिकारी कदम उठाएं जो कि शायद एक मिसाल भी बन जाएँ.सांता क्लॉस मूलतः गिफ्ट बाँटकर लोगों को खुशियाँ देते हैं.ठीक वैसे ही यदि हम में से हर व्यक्ति अगर चाहे तो अपने अपने दिलों में हम भी एक अदद सांता को पैदा कर सकते हैं.एक ऐसा सांता जो कि हमारी अतिव्यस्त दिनचर्या में से थोडा वक़्त चुराकर निशक्त जनों कि थोड़ी सी मदद अपने सामर्थ्य के अनुसार करे.फिर भले ही वो मदद छोट हो या बड़ी.वो मदद पैसों से हो या भावनात्मक सहारे से,परन्तु यदि हर व्यक्ति ऐसा कुछ करने कि कोशिश मात्र भी अगर शुरू कर दे तो हमें सांता क्लॉस के इंतज़ार में एक साल नहीं बिताना पड़ेगा,क्यूंकि हम सब ही कहीं ना कहीं,किसी ना किसी के लिए रोज़ ही सांता क्लॉस बनकर सामने आ जायेंगे.

ऐसा करके ना केवल हम किसी कि तकलीफों को दूर कर उसके होठों को मुस्कराहट प्रदान करेंगे बल्कि उन लोगों को जीवन कि अनमोल खुशियाँ भी देंगे.ज़रा सोचिये,हर व्यक्ति के एक छोटे से प्रयास से चारों ओर खुशहाली फ़ैल सकती है.सारा वातावरण ख़ुशी में सरोबार हो सकता है.ओर यह तो सभी जानते हैं कि खुशनुमा वातावरण हमारे उन्नत क़दमों को कितनी ताक़त प्रदान करता है.यही खुशनुमा वातावरण देश के हर नागरिक को अपनी काबलियत का भरपूर इस्तेमाल कर स्वयं की एवं देश की तरक्की के लिए पुरजोर प्रयास करने को बाध्य करेगा जिससे हम वास्तविकता में एक ऐसी आंतरिक ख़ुशी का अनुब हव करेंगे जिसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं है.

परन्तु क्या वास्तविकता में ऐसा कभी हो सकता है?ज़रा सोचिये?


लेखक:मोहित कुमार जैन
२५-१२-२००७

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