महफ़िल-ए-शेर-ओ-शायरी.....भाग १३

Thursday, June 16, 2011

आज भी उनकी नज़रों में राज़ वो ही था,
चेहरा वो ही था,चेहरे का लिबास वो ही था,
कैसे उनको मैं बेवफा कह दूं यारों,
आज भी उनके देखने का अंदाज़ वो ही था...........

भीगी आँखों से मुस्कुराने का मज़ा कुछ और है,
हँसते-हँसते पलके भिगोने का मज़ा कुछ और है,
बात कहके तो कोई भी समझा सकता है,
ख़ामोशी को गर कोई समझे तो मज़ा कुछ और है...

नब्ज़ मेरी देखकर,
मुझको इश्क का बीमार लिख गया,
मैं क्यूँ न हो जाऊं कुर्बान उस हकीम पर,
हो मेरे इलाज में दीदार उनका लिख गया............

आप न आये,आपकी याद आकर वफ़ा कर गयी,
आपसे मिलने की तमन्ना,सुकून तबाह कर गयी,
आहट कोई हुई तो सोचा दिल ने की मेरी दुआ असर कर गयी,
दरवाज़ा खोलकर देखा तो मज़ाक हमसे हवा कर गयी....

लफ़्ज़ों की तरह यादों की किताबों में मिलेंगे,
या बनके महक आपको गुलाबों में मिलेंगे,
मिलने के लिए हमसे ए दोस्त ज़रा ठीक से सोना,
आज हम दोस्तों से ख़्वाबों में मिलेंगे...

गीले कागज़ की तरह है ज़िन्दगी अपनी,
कोई जलाता भी नहीं,और कोई बहाता भी नहीं,
इस कदर अकेले रहे हैं राहों में दिल के,
कोई सताता भी नहीं और कोई मनाता भी नहीं...

ना जीना की ख़ुशी है,ना मरना का ग़म,
है अगर बस तो उनसे ना मिलने का ग़म,
जीते हैं इसी आस में ,कभी तो वो हमारे कहलायेंगे,
मरते नहीं इसीलिए की वो अकेले रह जायेंगे....

कुछ बिखरे सपने हैं,कुछ टूटी यादें हैं,
एक छोटा आसमान और एक उम्मीद की ज़मीन है,
यूँ तो बहुत कुछ है ज़िन्दगी में,
सिर्फ हम जिन्हें चाहते हैं,उन्ही की कमी है....

हमें आलम के अजीब उसूलों ने मार डाला,
कल काँटों ने मारा था,आज फूलों ने मार डाला....

अब क्या कहें ये लम्हा है कीमती कितना,
बहुत करीब बैठे हैं वो तसव्वुर में हमारे....

मेरी कब्र पर आये हैं वो फुर्सत निकालकर,
हम कैसे कह दें की उनसे नाराज़ हैं...

वो कागज़ के फूल थे,जो खुशबू ना दे सके,
हम यूँ ही बाग़ और बाग़बान को कोसते रहे....

कैसे समझायें हम अपने जज़्बात उनको,
कैसे बताएं दिल की बात उनको,
उनके हर ग़म,उनकी हर तकलीफ से वाकिफ हैं हम,
जाकर कोई हमारे भी तो हालात सुनाये उनको....

ए खुदा तुझसे दुआ है,मुझ पर एक एहसान कर दे,
किसी चंचल शोख हसीना से कहीं मेरी पहचान कर दे,
अगर वो नहीं आ सकती शर्म के मारे सामने हमारे,
तो अपने किसी करिश्मे से मुझे ही उनका मेहमान कर दे...

0 comments: