एक कविता.....

Tuesday, December 13, 2011

कभी अपनी हँसी पर भी आता है गुस्सा,
कभी सारे जहां को हँसाने को जी चाहता है,
कभी छुपा लेते हैं ग़मों को दिल के किसी कोने में,
कभी किसी को सब कुछ सुनाने को जी चाहता है,
कभी रोता नहीं दिल टूट जाने पर भी,
और कभी बस यूँ ही आँसू बहाने को जी चाहता है,
कभी हँसी सी आ जाती है बीती यादों पर,
तो कभी सब कुछ भुलाने को जी चाहता है,
कभी अच्छा सा लगता है आज़ाद उड़ना कहीं,
और कभी किसी की बाँहों में सिमट जाने को जी चाहता है,
कभी सोचते हैं की कुछ नया सा हो ज़िन्दगी में,
और कभी बस ऐसे ही जिए जाने को जी चाहता है........

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