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कुछ समझ नहीं आता

Wednesday, July 3, 2013

आजकल मीडिया के बीच में युवा वर्ग के आदर्श या प्रतिबिम्ब को लेकर ही बहस चलती रहती है| और मुझे हैरानी होती है देश के नासमझ मीडिया पर|किन बातों को ध्यान में रखकर कोई भी ऐरा-गैरा देश के करोड़ों युवाओं का प्रतिबिम्ब बन जाता है, या फिर मीडिया द्वारा ज़बरदस्ती बना दिया जाता है?? समझ ही नहीं आता|
 
राहुल गाँधी:-एक ४३ साल का अधेड़ व्यक्ति, कैसे युवा हो सकता है पता नहीं,शास्त्रों में ४० साल के व्यक्ति को युवा नहीं कहा जाता|पर तब पता चलता है की हमारे देश में सचिन तेंदुलकर को ४० की उम्र में बूढा कहा जा सकता है पर एक राजनेता ४० की उम्र में जवानी की देहलीज पर कदम रखता है|राहुल गाँधी माँ के साये में रहने वाला दब्बू किस्म का व्यक्ति है जो की चापलूसों से घिरा रहता है और देश के विकास की बात करता है.उसने विवाह नहीं किया जबकि शास्त्रों में इतनी उम्र तक कुँवारा रहना नहीं कहा गया है|कैसे वो आदर्श हो सकता है युवा वर्ग के लिए?? कुछ समझ नहीं आता|
 
रणबीर कपूर:-ड्रग्स,सिगरेट,शराब,लड्किबाज़ी सबमे हाथ आजमाया हुआ, १८ साल से फेले ही अपना कौमार्य खो चूका यह व्यक्ति क्या आज के युवा को रिप्रेजेंट करता है|मैं नहीं मानता|हिंदुस्तान का युवा ऐसा नहीं है|वो संस्कारी है,मत पिता की आगया मानने वाले,नशे की लत से दूर रहने वाले संस्कारी हैं,जो रणबीर कपूर तो नहीं लगता|फिर वो कैसे युवा वर्ग हुआ आज के हिंदुस्तान का?? कुछ समझ नहीं आता...
 
यदि आज के युवा वर्ग के रिप्रेजेन्टेटिव के रूप में किसी को लाना चाहिए मीडिया को तो वो भगत सिंह हैं जिन्होंने २३ की उम्र में हँसते-हँसते देश के लिए अपे प्राण कुर्बान कर दिए,वो नारायणमूर्ति हैं जिन्होंने स्वावलंबी जीवन जिया,खुद का उद्योग चालू किया और कईयों को रोज़गार दिया,आत्म-निर्भरता के गुण सिखाये नए उद्योग लगाने के सपने देखने वालों को,वो सचिन तेंदुलकर और राहुल द्रविड़ है जिनके कठोर परिश्रम का अनुसरण करके युवा किसी भी क्षेत्र में कोइस भी लक्ष्य पा सकते हैं...पर कैसे ये लोग आज के युवा वर्ग को रिप्रेजेंट नहीं करते??कुछ समझ नहीं आता...
 
मेरे आदर्श ये लोग हैं....वो पहले बताये हुए नहीं|और आपके??

Simply Awesome

Tuesday, June 18, 2013

लड़का हैंडसम होना चाहिए, ‘स्मार्ट’ तो फोन भी होते हैं।  
फोन तो आईफोन होना चाहिए, ‘S1, S2...S4’ तो ट्रेन के डिब्बे भी होते हैं।  
इंसान का दिल बड़ा होना चाहिए, ‘छोटा’ तो भीम भी है।  
व्यक्ति को समझदार होना चाहिए, ‘सेंसटिव’ तो टूथपेस्ट भी है।  
टीचर ज्यादा नंबर देने वाला होना चाहिए, ‘अंडा’ तो मुर्गी भी देती है। 
 युवा राष्ट्रवादी होना चाहिए, ‘कूल’ तो नवरत्न तेल भी है। 
 राष्ट्रपति कलाम होना चाहिए, ‘मुखर्जी’ तो रानी भी है।  
कैप्टन दादा जैसा होना चाहिए, ‘एमएस’ तो ऑफिस भी है।  
बाथरूम में हेयर ड्रायर होना चाहिए, ‘टॉवल’ तो श्रीसंत के पास भी है।  
लड़की में अक्ल होनी चाहिए, ‘सूरत’ तो गुजरात में भी है।  
मोबाइल जनरल मोड पर होना चाहिए, ‘साइलेंट’ तो मनमोहन भी हैं।  
सेब मीठा होना चाहिए, ‘लाल’ तो आडवाणी भी हैं।  
लड़का द्रविड जैसा होना चाहिए, ‘राहुल’ तो गांधी भी है।  
घूमना तो हिल स्टेशन पर चाहिए, ‘गोवा’ तो पान मसाला भी है।
दवाई ठीक करने के लिए होना चाहिए, ‘टेबलेट’ तो सैमसंग का भी है।  
रिप्लाई ढंग का होना चाहिए, ‘हम्म’ तो भैंस भी करती है।

कंक्रीट के जंगल

Monday, June 17, 2013

आज चारों ओर जब देखता हूँ बड़े बड़े शहरों की जीवनशैली तो बस लगता है की क्या यह वास्तव में जीवन है या सिर्फ एक समझौता जो लोग कर रहे हैं अपनी आज़ाद ज़िन्दगी के साथ,कुछ कंक्रीट के जंगलों में रहने के लिए.अफ़सोस होता है उन लोगों पर जो मानव के आज़ाद और स्वछन्द व्यवहार को एक बड़े शहर की कंक्रीट की किसी बड़ी बिल्डिंग में क़ैद कर देते हैं और फिर भी खुश हैं?या समझौते को ख़ुशी का नाम दे दिया है.आज की पीढ़ी से कहीं बेहतर वो पुरानी पीढ़ी लगती है.हमारे पास कंक्रीट की बिल्डिंग में एक कमरे का घर है जिसमे दो लोगों का रहना भी अजनबियों के रहने जैसा लगता है क्यूंकि दिलों का मिलाप नहीं है,पुरानी जगह पर एक पुराने घर में भी पूरा क़स्बा हमेशा आमंत्रित रहता है क्यूंकि दिलों के तार ज्यादा मजबूती से जुड़े हैं.आज के कंक्रीट के जंगले के निवासियों के घर में एक पालतू कुत्ते का बच्चा है तो पुरानी जगह पर चिड़ियों का कलरव,मवेशियों की चहल-पहल और प्रकृति का अप्रतिम सौंदर्य है दिनभर निहारने के लिए.आज घरों से ज्यादा दिलों में दूरियां है बड़े शहरों में,पुरानी जगह आज भी दिल के तार जुड़े हुए दिखाई देता हैं.रह रहकर लगता है की शायद मेरी अंतर-आत्मा इस कंक्रीट के जंगले में क़ैद होने के लिए नहीं है...मुझे तो फिर वोही पुराने दिन और पुरानी यादें वापस चाहिए.शायद मैं इस आधुनिक दुनिया की तरक्कियों से दूर हो जाऊं पर मेरे लिए वो मायने नहीं रखता.अपनों का साथ,उनका प्यार और आशीर्वाद किसी भी तरक्की से ज्यादा मूल्यवान है...और मुझे ख़ुशी है अपने इस चुनाव पर...लेकिन फिर यह सोचता हूँ की क्या और कोई भी ऐसा सोच पायेगा या पिसे रह जायेंगे बाकी लोग इस कंक्रीट के जंगले में...एक अंतहीन,जंगले,जिसमे कोई संवेदना नहीं,कोई भावना नहीं,बस चले जा रहे है सब भेड़ बकरियों की तरह ना जाने किस दिशा में....मैं खुश हूँ उस झुण्ड में मैं शामिल नहीं हूँ....

सचिन @ 40

कुछ महीनो पहले क्रिकेट के भगवान् सचिन तेंदुलकर ने क्रिकेट से हमेशा के लिए अलविदा कह दिया.कहते भी क्यूँ नहीं,जब भगवान् का दर्जा देने वाले भक्त ही भगवान् की प्रतिष्ठा पर सवाल उठाने लग जाए तो एक आदर्श इश्वर-स्वरूपी को स्वयं को इस कीचड़ से अलग कर लेना ही चाहिए था और वैसा ही हुआ भी.दुनिया उगते सूर्य को प्रणाम करती है परन्तु सचिन एक कभी भी अस्त न होने वाले सूर्य की तरह भारतीय क्रिकेट पर हमेशा छाये रहेंगे.मुझे आज भी आश्चर्य होता है की जब ४५ साल के एक नेता को युवा कह कर युवा वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में जबरन प्रदर्शित कर उसे राष्ट्रीय राजनीती में लाने की क़वायत चलती है तो ४० साल का सचिन तेंदुलकर बूढ़ा कैसे हो जाता है.क्या सचिन जैसा महान क्रिकेटर टीम में रहकर युवा पीढ़ी का सही मार्गदर्शन नहीं कर सकता? और इस बात का फैसला करने वाले वो लोग होते हैं जिन्होंने कभी हाथ में क्रिकेट का बैट-बॉल भी नहीं पकड़ा हो.आश्चर्य होता है लोगों की मानसिकता पर...मैं आज भी मानता हूँ की देश को सचिन जैसे कठोर परिश्रमी और आदर्श लोगों की ज़रुरत है नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करने की बजाय इसके की एक ४५ साल का बूढ़ा,माँ की गोद में सिमटा हुआ "पप्पू" किस्म का व्यक्ति नई पीढ़ी का आदर्श बने....जय हिन्द...

भारतीय रेल

Monday, April 22, 2013

भारतीय रेल----एक माध्यम जिसे आम आदमी अपनी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा मानता है|भारतीय रेल हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग है,परन्तु जैसी आज कल की रेल व्यवस्था है उसे देखकर नहीं लगता की आम आदमी का विश्वास इस सबसे महत्वपूर्ण साधन में अधिक रहा है|मैं खुद रेलगाड़ी में ही सफ़र करता हूँ और अधिकतर Sleeper Class में,परन्तु वो दर्जा  जिसमे अधिकतम भारतीय सफ़र करते हैं,वो ही रेलवे विभाग के द्वारा सबसे ज्यादा अनदेखा किया हुआ है|रेलवे की pantry can ही नहीं अपितु हर जंक्शन/स्टेशन पर खड़े रहने वाले vendors भी कोई भी सामन उसके अधिकतम खुदरा मूल्य(MRP)पर नहीं देते हैं,पूछने पर कहते हैं की हम क्या कमाएंगे जबकि हमारी सरकार टेलीविज़न पर खूब प्रचार प्रसार करती है की MRP से ज्यादा में सामान बेचना गैर-कानूनी है|फिर रेलवे क्यूँ इसके दायरे में आती?कोई जवाब नहीं है.....शायद किसी के पास नहीं|एक आम माध्यमवर्गीय परिवार से सम्बन्ध रखने वाला आम आदमी इस बहस में पढ़कर अपना बहुमूल्य समय बर्बाद नहीं करना चाहता,उच्च मध्यमवर्गीय लोग २-४ रुपयों के लिए किसी छोटे  आदमी के मुंह नहीं लगना चाहते और रेलवे मिनिस्टर गुणगान करते हैं अपने आदर्श रेलवे बजट के जो ना जाने कैसे आदर्श है|इसका उपाय यही हो सकता है की आम आदमी जाग जाए|हर चोर vendor की फोटो खींचकर मीडिया में दें,ऐसे चोरों से सामन खरीदना बंद करें,असहयोग आन्दोलन करें,अपने वोट का सही इस्तेमाल करें,इत्यादि-इत्यादि.....परन्तु क्या सच में ऐसा करने का दम है किसी आम आदमी में,मैंने कोशिश की थी,परन्तु मुझे और मेरी कोशिशों को किसी का सहयोग नहीं मिला और मैं अकेले ही चल पड़ा भ्रष्टाचार से लड़ने,परन्तु शायद जीत न पाऊं.... अन्ना हजारे भी लड़ना चाहते थे भ्रष्टाचार से,परन्तु आश्वासन ही आश्वासन लेकर रह गए...फिर मैं अकेला क्या कर लूँगा....क्या कोई है जो साथ चलेगा या फिर यूँ ही बस कलम कागज़ लिए अपने विचारों को उतारता ही रह जाऊँगा....पता नहीं....
 
एक आम भारतीय 

स्वाभिमान

Monday, January 7, 2013

मेरे दोस्त ने कहा- "स्वाभिमानी बनो, तो बहुत आगे बढोगे" मैंने कहा- शहर आने से पहले, मेरे पास भी "एक" स्वाभिमान था. बसों में धक्के खाके, सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाके, नैराश्य के धूप में जलके, असफलता की बारिश में गल के, अंततः थक कर और चूर होके, मैंने स्वाभिमान को" पुरानी " पतलून की किसी जेब में रख दी. आज उसके कहने पर मैंने, फिर उस पतलून को ढूंढा: उसकी जेब में बड़ा सा छेद था, और स्वाभिमान गायब था कहीं. पर, हाँ, मैं,सचमुच,आज, "बहुत आगे बढ़ चुका हूँ".मेरे दोस्त ने कहा- "स्वाभिमानी बनो, तो बहुत आगे बढोगे" मैंने कहा- शहर आने से पहले, मेरे पास भी "एक" स्वाभिमान था. बसों में धक्के खाके, सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाके, नैराश्य के धूप में जलके, असफलता की बारिश में गल के, अंततः थक कर और चूर होके, मैंने स्वाभिमान को" पुरानी " पतलून की किसी जेब में रख दी. आज उसके कहने पर मैंने, फिर उस पतलून को ढूंढा: उसकी जेब में बड़ा सा छेद था, और स्वाभिमान गायब था कहीं. पर, हाँ, मैं,सचमुच,आज, "बहुत आगे बढ़ चुका हूँ".

खो ना जाएँ यह तारे ज़मीन पर......

Friday, June 10, 2011

अभी हाल ही में मैंने आमिर खान कि फिल्म "तारे ज़मीन पर" देखी.उस फिल्म में आमिर खान के प्रयासों ओर उसके ज़रिये बताई गयी बातों ने ह्रदय को गहराई तक स्पर्श किया.कई दृश्यों में ऐसा लगा मानो हमारे वास्तविक जीवन कि परिस्थितियाँ परदे पर उतर आई हों.

उस फिल्म में expectations पर ख़ास बातें कि गयी हैं जो कि अत्यंत हृदयस्पर्शी हैं.वास्तविकता में यदि हम आंकलन करें तो हम यह पायेंगे कि अपनी सामजिक संरचना को expectations के ज़रिये एक ऐसे जाल में तब्दील कर चुके है जहाँ फँसना सबकी मजबूरी जैसी हो गयी है.

हमने ऐसी मानसिकता ओर व्यवस्था बना ली है कि यदि हमारी expectations (स्वयं से या किसी ओर से) पूरी होती हैं तो हम expectations के दायरे को ओर बड़ा कर देते हैं ओर यदि यह expectations पूरी नहीं होती हैं तो हम सामने वाले के तमाम प्रयासों ओर म्हणत को नकार कर उसे नकारात्मक दृष्टिकोण से देखने लगते हैं जैसे यह कोई अक्षम्य अपराध हो.

पर इन सब चक्करों में यह वास्तविकता भूल जाते हैं कि हर मनुष्य परमपिता परमेश्वर कि अनमोल कृति है,जिसमे कोई ना कोई विशेष गुण अवश्य मौजूद द्रेहता है.आवश्यकता यदि है तो तो बस उस खूबी को पहचान कर उसे सही तरीके से निखारने कि.उसके बाद जो जादुई परिणाम उभर कर सामने आयेंगे वो आज कि सामाजिक संरचना कि सोच से भी परे होंगे.

वास्तविकता तो यह है कि हर मनुष्य तारे-सितारों कि तरह है,बस उसे अपनी चमक को खोने नहीं देना चाहिए चाहे कितनी भी विषम परिस्थितियाँ जीवन में खड़ी हो जाएँ.

यदि हम अपनी expectations के दायरे को इस सामाजिक भूल-भुलैया से निकालकर स्वयं तक सीमित रखें अर्थात self-expectations कि ओर अपना ध्यान केन्द्रित करें तो अवश्य ही मुमकिन है कि हर मनुष्य अपने-अपने क्षेत्र में ध्रुव तारे के समान चमके.

मेरा मन तो कहता है की मौजूदा सामाजिक संरचना को नकार कर ऐसा ही करना चाहिए जैसा मैंने अभी-अभी वर्णन किया परन्तु सिर्फ किसी व्यक्ति विशेष के प्रयत्न से संरचना का पुनर्गठन नहीं हो सकता. इसके लिए ज़रूरी है सबके सतत प्रयासों कि परन्तु तभी मस्तिष्क में यह विचार कौंध जाता है कि क्या वास्तविकता में ऐसा होना मुमकिन है या कई तारे यूँ ही ज़मीन पर खो जायेंगे?

जवाब मेरे पास शायद है भी ओर नहीं भी.....


लेखक:-मोहित कुमार जैन
२६-१२-२००७

मैं भी Santa Clause...........

"सांता क्लॉस" नाम एक ऐसा नाम है जिससे संपूर्ण विश्व के लगभग सभी लोग परिचित होंगे.क्रिसमस पर सभी लोगों को अगर किसी ख़ास का इंतज़ार सबसे ज्यादा रहता है तो शायद वो सांता क्लॉस ही है.सिर्फ बच्चे ही नहीं,अपितु बड़े भी सांता से गिफ्ट्स पाकर खिल उठते हैं.हर कोई बस यही सोचता है कि काश सांता से अगली मुलाकात के लिए एक साल लम्बा इंतज़ार नहीं करना पड़े.परन्तु ऐसा हो नहीं पाटा क्यूंकि वो सांता तो फिर अगले साल २५ दिसम्बर को ही वापस आता है.

मगर हम क्या कभी यह सोचते हैं कि सांता को हम अपने कार्यों से पूरे साल अपने करीब महसूस कर सकते हैं,बस ज़रुरत है सही कदम उठाने कि.मगर कैसे?शायद मेरे यह कुछ विचार इन सवालों को हल करने में थोड़ी सी मदद करें.

क्यूँ ना हम कुछ ऐसा करें कि सांता क्लॉस कि मूल विचारधारा को अपने व्यक्तिगत जीवन में उतार कर कुछ क्रांतिकारी कदम उठाएं जो कि शायद एक मिसाल भी बन जाएँ.सांता क्लॉस मूलतः गिफ्ट बाँटकर लोगों को खुशियाँ देते हैं.ठीक वैसे ही यदि हम में से हर व्यक्ति अगर चाहे तो अपने अपने दिलों में हम भी एक अदद सांता को पैदा कर सकते हैं.एक ऐसा सांता जो कि हमारी अतिव्यस्त दिनचर्या में से थोडा वक़्त चुराकर निशक्त जनों कि थोड़ी सी मदद अपने सामर्थ्य के अनुसार करे.फिर भले ही वो मदद छोट हो या बड़ी.वो मदद पैसों से हो या भावनात्मक सहारे से,परन्तु यदि हर व्यक्ति ऐसा कुछ करने कि कोशिश मात्र भी अगर शुरू कर दे तो हमें सांता क्लॉस के इंतज़ार में एक साल नहीं बिताना पड़ेगा,क्यूंकि हम सब ही कहीं ना कहीं,किसी ना किसी के लिए रोज़ ही सांता क्लॉस बनकर सामने आ जायेंगे.

ऐसा करके ना केवल हम किसी कि तकलीफों को दूर कर उसके होठों को मुस्कराहट प्रदान करेंगे बल्कि उन लोगों को जीवन कि अनमोल खुशियाँ भी देंगे.ज़रा सोचिये,हर व्यक्ति के एक छोटे से प्रयास से चारों ओर खुशहाली फ़ैल सकती है.सारा वातावरण ख़ुशी में सरोबार हो सकता है.ओर यह तो सभी जानते हैं कि खुशनुमा वातावरण हमारे उन्नत क़दमों को कितनी ताक़त प्रदान करता है.यही खुशनुमा वातावरण देश के हर नागरिक को अपनी काबलियत का भरपूर इस्तेमाल कर स्वयं की एवं देश की तरक्की के लिए पुरजोर प्रयास करने को बाध्य करेगा जिससे हम वास्तविकता में एक ऐसी आंतरिक ख़ुशी का अनुब हव करेंगे जिसे शब्दों में बयान करना आसान नहीं है.

परन्तु क्या वास्तविकता में ऐसा कभी हो सकता है?ज़रा सोचिये?


लेखक:मोहित कुमार जैन
२५-१२-२००७

Mr.India

Thursday, June 9, 2011

आजकल वैज्ञानिक एक ऐसा परिधान डिजाईन करने में लगे हैं जिसे पहनकर मनुष्य गायब(या अदृश्य) हो सकता है,ठीक वैसे ही जैसे अनिल कपूर फिल्म मिस्टर इंडिया में हो जाते थे.

मनुष्य की यह अविश्वसनीय सफलता वाकई तारीफ के काबिल है पर क्या वास्तव में मनुष्य को ऐसी कोई खोज करनी चाहिए?क्या वास्तव में मनुष्य को गायब होने की ज़रुरत है?अगर इन सवालों का अर्थ हम अपने मन में झांककर खोजें तो अवश्य ही मिल जाएगा.

मुझे नहीं लगता की आज के युग में मनुष्य को गायब होने की कोई आवश्यकता है.इस भाग०दौद भरी ज़िन्दगी में सबकी अपनी अलग पहचान वैसे ही गायब हो जाती है.और ऊपर से हमारी व्यस्तता हमारे रिश्तों,हमारी भावनाओं, और हमारी संवेदनाओं को भी धीरे-धीरे गायब करती जा रही है.जब इतना कुछ "अच्छा" गायब हो रहा है तो ऊपर से मनुष्य भी अगर गायब हो जाए तो गज़ब हो जाएगा.ज़रूरी तो यह है की हम खुद को गायब करने के तरीके ईजाद करने की जगह आस-पास की बुराइयों को गायब करने के तरीके सोचें.हम सोचें की कैसे देश से भ्रष्टाचार,अपराध,भुखमरी,गरीबी गायब हो,कैसे घपले और घोटाले करने वाले नेताओं के बैंक अकाउंट से रुपैये गायब होकर गरीब जनता तक पहुंचे,कैसे हमारी कुंठित सोच गायब हो,कैसे सामाजिक कुरीतियाँ जैसे दहेज़,बलात्कार की घटनाएं आदि गायब हों.अगर वास्तव में किसी दिन यह सब गायब हो गया तो फिर हमारा जीवन इतना सुखमय हो जाएगा की किसी को भी गायब होने किए ज़रुरत ही नहीं पड़ेगी.

और अगर मान लो की मनुष्य को गायब करने में सफलता हाथ लग भी गयी,तो भी इस खोज के दुष्परिणाम सामने नहीं आयेंगे,इस बात की क्या गारंटी है.कई मनुष्य गायब होने की इस नायब कला का इस्तेमाल अपने फायदे या अपराध बढाने के लिए भी कर सकते हैं.हमारी आधारभूत संरचना ही ढेह सकती है और भी कई दुष्परिणाम हो सकते हैं.

इसीलिए ज़रूरी है की हम गायब होकर अपनी जिम्मेदारियों से बचने का नया तरीका नहीं निकालें अपितु हिम्मत से मुश्किलों का सामना कर विजयश्री हासिल करें ताकि एक दिन हम सभी सच्चे अर्थों में मिस्टर इंडिया बन सकें.

जय-हिंद
लेखक:मोहित कुमार जैन
दिनाँक:-०८-०४-२००७

सांता क्लॉस के नाम एक पत्र..............





आदरणीय सांता क्लॉस,

आज तक आप को बच्चों के कई पत्र मिले होंगे परन्तु शायद मुझ जैसे एक व्यस्क का पत्र बहुत ही कम मिला होगा.मेरा यह पत्र आपके लिए इसीलिए है क्यूंकि मैं इस क्रिसमस पर आपसे कुछ विशेष गिफ्ट चाहता हूँ जिसकी विनती इस पत्र के माध्यम से करना चाहता हूँ.

यूँ तो आप इश्वर के दूत की तरह हैं जो सबको खुशियाँ बाँटता है एवं सभी की भावनाओं का ख़याल रखता है और इसीलिए आज आपसे मैं एक अनमोल तोहफे की माँग करने जा रहा हूँ.

प्यारे सांता,मैं आपसे कहना चाहता हूँ की इस क्रिसमस पर मुझे और समस्त मानव जाति को प्रभु की तरफ से एक ऐसा वरदान दो की सभी व्यक्ति सदा खुशहाली का अनुभव करें.हम तुच्छ प्राणी,जाति-धर्म-दौलत आदि जैसी बेतुकी बातों में उलझना भूलकर आपसी प्रेम एवं शान्ति के साथ जीवन व्यतीत करते हुए सदैव अपने देश,अपने परिवार और स्वयं की उन्नति के लिए कार्य करें.मन में कभी भी किसी भी प्रकार का राग-द्वेष किसी के लिए भी पैदा ना हो.

हर मानव सांता क्लॉस जैसा सच्चा,हँसमुख,सहृदय प्रतिबिम्ब अपने मन में विकसित करे और आस-पास मौजूद,नि:शक्त जनों की मदद कर स्वयं और उन लोगों की वास्तविक ख़ुशी का कारण बने.

झूठे आडम्बरों में ना उलझ कर हम सादगी पूर्ण जीवन जियें एवं प्रकृति का अनुचित दोहन रोकने में सदा तत्पर रहे.ना तो हम राजनीतिक चालों में कभी फँसें,और ना ही हमारे बीच कोई व्यर्थ के मतभेद और मनभेद खड़े कर हमारी कमियों का फायदा उठाने की कोशिश करे.

हम स्वयं की कमज़ोरियों को ताक़त में तब्दील कर सर्वप्रथम स्वयं को एक बेहतर इंसान बनाने की कोशिश करें और उसके बाद उस परम पिता परमेश्वर का धन्यवाद अदा करें जिसने हमें तस्वीर के रंगों सी रंग बिरंगी प्रकृति और अदभुत जीवन दिया.

ना कभी कोई किसी की अक्षमता पर हँसे, ना कोई किसी से बैर भाव रखे.ना मन में जलन की भावना हो और ना किसी को हम कभी नीचा दिखायें.

मैं जानता हूँ की मैंने जो माँगा है वो आपकी और प्रभु की देने की क्षमता से बहुत तुच्छ परन्तु फिर भी आज के ज़माने में कठिन है,परन्तु यदि आप कोशिश करके देखें तो शायद दुनिया का एक नया चेहरा उभर सके पुराने सारे नकाब उतार कर.

आशा है आप मेरे गिफ्ट के बारे में प्रभु से विस्तार पूर्वक चर्चा ज़रूर करेंगे.

आपके जवाब का प्रतीक्षार्थी,
एक तुच्छ मानव
२६-१२-२००७

पहली बारिश और पहला प्यार............


दो बातें.....पहली बारिश और पहला प्यार,किसी भी इंसान को एक सुखद अनुभूति देती ही है. आखिर ऐसी क्या कशिश है इन दोनों में जो हमारे मन में एक अलग उत्साह का संचार हो जाता है इन्हें देखकर,हम जीवन का आनंद एक नए अंदाज़ में उठाने लगते हैं इनके हमारी ज़िन्दगी में दाखिल होते ही.कुछ न कुछ बात तो ज़रूर है.शायद जानी-पहचानी सी या शायद कोई अनकही अबूझ पहेली सी.

साल की पहली बारिश कुछ इसीलिए ख़ास होती है क्यूंकि ये न केवल गर्मी और उमस भरे माहौल से निजात दिलाती है बल्कि एक नया उत्साह भी संचारित करती है सूखे,धूल,उमस से जूझते आम इंसानों,किसानो,जानवरों,यहाँ तक की पेड़-पौधों में भी.यह एक प्राकृतिक सन्देश की तरह होती है,एक नए सृजन का सन्देश,तकलीफ भरी धुप पर शीतलता की हवा की विजय का सन्देश,बेचैन जनमानस को नया चैन और आराम का पथ दिखाने वाली शीतल बूंदों के त्याग का सन्देश जो बरसती रहती हैं निरंतर बिना भेद-भाव के,अपने मूल रूप में,बिना अपने परिणाम की परवाह किये की क्या वे किसी की प्यास बुझा पाएंगी या सड़क पर कीचड बनकर ही सिमट कर रह जायेंगी.

ठीक कुछ इसी तरह ही पहला प्यार भी मनुष्य का संपूर्ण जीवन ही बदल देता है.अकेले ही ज़िन्दगी के तूफानों से लड़ते,सभी परेशानी उठाते मनुष्य को सहारा देता है पहला प्यार,जिसके आने से मानो ज़िन्दगी के मायने ही बदल जाते है.जब हम किसी को अपने साथ खड़ा पाते हैं,कोई ऐसा हमें नज़र आता है जिसे हमारी चिंता है,जिसे हम पर पूर्ण विश्वास है तो अपने अप्प ही हमारे अन्दर एक ऐसी आलौकिक ऊर्जा का संचार होता है की हम हर कठिनाई का डट कर मुकाबला कर उससे पार पाने को तैयार हो जाते हैं.

यह कैसी अजीब सी जादुई शक्ति है पहले प्यार और पहली बरसात की बूंदों में जो हमें न केवल लड़ने की प्रेरणा देती हैं अपितु विजयपथ पर हमारा पथ-प्रदर्शक बन हमें अकेलेपन से भी मुक्त कराती हैं.

और अगर किसी को अपना पहला प्यार,पहली बारिश में मिला हो तो इस प्राकृतिक और मानवीय ताक़त का समागम अविस्मर्णीय होता है.बहुत किस्मत वाले होते हैं वोह लोग जो एक साथ,एक ही पल में पहले प्यार और पहली बारिश दोनों का सुख भोग पाते हैं,पर कुछ बदनसीब ऐसे भी होते हैं जिन्हें शायद दोनों ही नसीब नहीं होते और कुछ बदनसीब(या आधे बदनसीब) ऐसे भी होते हैं जिन्हें पहली बारिश की शीतलता तो भिगो देती है पर पहले प्यार की नाकामयाबी की आग ह्रदय को जला देती है.पर ऐसी स्तिथि पर विजय प्राप्त करने वाला ही सच्चे अर्थों में जीवन का आनंद उठा पाता है क्यूंकि ज़िन्दगी तो चलते रहने का नाम है ना की नाकाम पहले प्यार की याद में रोकर पहली बारिश का मज़ा भी किरकिरा करने में.लेकिन यह बात कहना जितनी आसान लग रही है,हकीकत में उतनी ही तकलीफदायक होता है पहले प्यार को भूल पाना.शायद इस बात को वो लोग जानते हैं जिन्होंने अपना पहला प्यार खोया होता है,जैसे की........


लेखक:-मोहित कुमार जैन
१८-०५-२००७

तुमसे मिलकर.............

Wednesday, June 8, 2011



तुमसे मिलकर ऐसा लगा मानो मैं अपने जीवन की प्रेरणा या एक मुकम्मल मकसद से मिल रहा हूँ तुम्हारे साथ की हुई बातें और बिठाये हुए लम्हों ने मानो मेरे जीवन को एक नयी दिशा प्रदान की है तुमसे मिलकर ना जाने क्यूँ जीवन के उन अनछुए एहसासों ने अंगडाई लेना शुरू कर दिया है जिन्हें आज तक कोई समझ ही नहीं सका पर तुम्हारा साथ, तुम्हारा विश्वास पाकर मेरी भावनाओं ने भी उम्मीदें सजाना शुरू कर दी हैं

आजतक ना जाने क्यूँ जो अकेलापन जीवन में महसूस होता था,अब तुमसे मिलकर उस अकेलेपन से भी मुझे राहत मिलने लगी है और ऐसा लगने लगा है जैसे मेरे अधूरे जीवन को पूरा करने के लिए ही शायद तुम मेरे जीवन में आई हो शायद ईश्वर की ही इच्छा का परिणाम है की मुझे तुम्हारे जैसी दोस्त एक तोहफे के रूप में मिली है जिसके साथ मैं जीवन की छोटी-छोटी खुशियाँ बाँटकर कुछ सुकून के पलों को अपनी यादों की किताब में संजो का रख सकता हूँ

आज जीवन के इस मोड़ पर तुम ही हमसफ़र, तुम ही दोस्त और तुम ही एक प्रेरणा के रूप में मुझे नज़र आती हो और सदा ही ईश्वर से मैं यह दुआ माँगता रहता हूँ की तुम ही मेरे जीवन में खुशियों की सौगात लेकर आओ और मैं भी तुम्हारे जीवन में खुशियों के रंग भर दूं

तुम मेरे जीवन की कविता के शब्द बन जाओ, तुम मेरी जीवन-गाथा की धुन बन जाओ, और मैं तुम्हे पाकर जीवन की हर ख़ुशी पा लूँ, बस यही दुआ मैं आज और आज के बाद हर पल खुदा से करूँगा

भगवान के भोग में डाले जाते हैं तुलसी के पत्ते क्योंकि...

Wednesday, May 25, 2011

भगवान को भोग लगे और तुलसी दल न हो तो भोग अधूरा ही माना जाता है। तुलसी को परंपरा से भोग में रखा जाता है क्योंकि शास्त्रों के अनुसार तुलसी को विष्णु जी की प्रिय मानी जाती है। शास्त्रों के अनुसार तुलसी डालकर भोग लगाने पर चार भार चांदी व एक भार सोने के दान के बराबर पुण्य मिलता है और बिना तुलसी के भगवान भोग ग्रहण नहीं करते उसे अस्वीकार कर देते हैं।

भोग में तुलसी डालने के पीछे सिर्फ धार्मिक कारण नहीं है बल्कि इसके पीछे अनेक वैज्ञानिक कारण भी है।तुलसी दल का औषधीय गुण है। एकमात्र तुलसी में यह खूबी है कि इसका पत्ता रोगप्रतिरोधक होता है। यानि कि एंटीबायोटिक। संभवत: भोग में तुलसी को अनिवार्य किया गया कि इस बहाने ही सही लोग दिन में कम से कम एक पत्ता ग्रहण करें ताकि उनका स्वास्थ्य ठीक रहे। इस तरह तुलसी स्वास्थ्य देने वाली है। तुलसी का पौधा मलेरिया के कीटाणु नष्ट करता है।

नई खोज से पता चला है इसमें कीनोल, एस्कार्बिक एसिड, केरोटिन और एल्केलाइड होते हैं। तुलसी पत्र मिला हुआ पानी पीने से कई रोग दूर हो जाते हैं। इसीलिए चरणामृत में तुलसी का पत्ता डाला जाता है। तुलसी के स्पर्श से भी रोग दूर होते हैं। तुलसी पर किए गए प्रयोगों से सिद्ध हुआ है कि रक्तचाप और पाचनतंत्र के नियमन में तथा मानसिक रोगों में यह लाभकारी है। इससे रक्तकणों की वृद्धि होती है। तुलसी ब्रह्मचर्य की रक्षा करने एवं यह त्रिदोषनाशक है। रक्तविकार, वायु, खांसी, कृमि आदि की निवारक है तथा हृदय के लिए हितकारी है।

अक्षय तृतीया के दिन नया काम करना शुरू करना शुभ क्यों माना जाता है?

अक्षय तृतीया या आखा तीज वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को कहते हैं। इस तिथि को आखातीज के नाम से भी पुकारा जाता है।पौराणिक ग्रंथों के अनुसार इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है।इसी कारण इसे अक्षय तृतीया कहा जाता है कि इस दिन शुरू किए जाने वाले काम का अक्षय फल मिलता है।

ऐसा माना जाता है कि आज के दिन जाने-अनजाने अपराधों की सच्चे मन से ईश्वर से क्षमा प्रार्थना करे तो भगवान उसके अपराधों को क्षमा कर देते हैं और उसे सदगुण प्रदान करते हैं, अतः आज के दिन अपने दुर्गुणों को भगवान के चरणों में सदा के लिये अर्पित कर उनसे सदगुणों का वरदान मांगना चाहिए।पौराणिक कहानियों के मुताबिक, इसी दिन महाभारत की लड़ाई खत्म हुई।

द्वापर युग का समापन भी इसी दिन हुआ। इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर के पूछने पर यह बताया था कि आज के दिन जो भी रचनात्मक या सांसारिक कार्य करोगे, उसका पुण्य मिलेगा। कोई भी नया काम, नया घर और नया कारोबार शुरू करने से उसमें बरकत और ख्याति मिलेगी। माना जाता है कि अक्षय तृतीया के दिन स्नान, ध्यान, जप तप करना, हवन करना, स्वाध्याय पितृ तर्पण करना और दान पुण्य करने से पुण्य मिलता है। देवताओं की पूजा करने को भी उन्होंने पुण्य बताया है। इसीलिए इस दिन कोई भी नया काम शुरू करना बहुत शुभ माना जाता है।

सिन्दूर का नहीं चंदन का तिलक लगाना चाहिए क्योंकि...

पूजा के समय तिलक लगाने का विशेष महत्व है और भगवान को स्नान करवाने के बाद उन्हें चन्दन का तिलक किया जाता है।पूजन करने वाला भी अपने मस्तक पर चंदन का तिलक लगाता है। यह सुगंधित होता है तथा इसका गुण शीतलता देने वाला होता है।

भगवान को चंदन अर्पण करने का भाव यह है कि हमारा जीवन आपकी कृपा से सुगंध से भर जाए तथा हमारा व्यवहार शीतल रहे यानी हम ठंडे दिमाग से काम करे। अक्सर उत्तेजना में काम बिगड़ता है। चंदन लगाने से उत्तेजना काबू में आती है।

स्त्रियों को मस्तक पर कस्तूरी का तिलक या बिंदी लगाना चाहिए। गणेशजी, हनुमानजी, माताजी या अन्य मुर्तियों से सिंदूर निकालकर ललाट पर नही लगाना चाहिए। सिंदूर उष्ण होता है। चंदन का तिलक ललाट पर या छोटी सी बिंदी के रूप में दोनों भौहों के मध्य लगाया जाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से चंदन का तिलक लगाने से दिमाग में शांति, तरावट एवं शीतलता बनी रहती है। मस्तिष्क में सेराटोनिन व बीटाएंडोरफिन नामक रसायनों का संतुलन होता है। मेघाशक्ति बढ़ती है तथा मानसिक थकावट विकार नहीं होता।

क्यों और कौन सी पांच चीजें बनाती हैं पूजा को सफल?

शास्त्रों के अनुसार पूजा में दूध, दही, घी, शहद और मिश्री का उपयोग होता है इन पांच चीजों के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है।

हिन्दू धर्म में इन पांचों को पवित्र माना गया है। और जब इन पांचों को मिलाया जाता है तब इसे पंचामृत कहा जाता है। पंचामृत यानि पांच अमृत।

पंचामृत का पहला भाग दूध होता है जो हमें गाय से मिलता है गाय में देवी देवताओं का वास होने से दूध को अमृत माना गया है।

पंचामृत का दूसरा और तीसरा भाग दही एवं घी दूध से ही प्राप्त होता है इसलिए यह भी अमृत माना गया है।

हिन्दू धर्म में शहद पूर्ण पवित्र रस माना गया है। भगवान को चढऩे वाले सुगन्धित फूलों के रस से ही शहद बनता है इसलिए यह पवित्र और अमृत के समान है। पंचामृत का पाचवां भाग मिश्री होता है जिसको इन सब में मिलाने से पूर्ण अमृत बनता है।

कहीं कही गन्ने का रस भी शुद्ध और पवित्र होने के कारण उपयोग किया जाता है।स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाए तो प्रसाद के रूप में पंचामृत यानि इन सब चिजों से बने मिश्रण को खाने से सभी प्रकार के रोगों का नाश भी होता है।

दरअसल पंचामृत आत्मोन्नति का प्रतीक है। यह पांचों सामग्री किसी न किसी रूप में आत्मोन्नति का संदेश देती है।

दूल्हा-दुल्हन की मांग में सिंदूर क्यों भरता है?

हमारे देश में विवाह संस्कार से जुड़ी अनेक परंपराएं हैं। हिन्दू विवाह पद्धति में कुछ परंपराएं ऐसी हैं जिनका निर्वाह शादी में नहीं किया जाए तो शादी पूरी नहीं मानी जाती है जैसे मंगलसुत्र पहनाना, मांग में सिंदूर भरना, बिछिया पहनाना आदि।



इन रस्मों का निर्वाह शादी में तो किया ही जाता है साथ ही इन सभी चीजों को सुहागन के सुहाग का प्रतीक माना जाता है।इसीलिए हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार इन्हें सुहागनों का अनिवार्य श्रृंगार माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इन श्रृंगारों के बिना सुहागन स्त्री को नहीं रहना चाहिए।



किसी भी सुहागन स्त्री के लिए मांग में सिंदूर भरना अनिवार्य माना गया है। हिन्दू शादी में बहुत से रिवाज निभाए जाते है।



शादी में निभाई जाने वाली सभी रस्मों में फेरों की रस्म सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। फेरों के समय वधू की माँग सिंदूर से भरने का प्रावधान है। शादी में मांग सिंदूर व चांदी के सिक्के से भरी जाती है। मांग भर विवाह के पश्चात् ही सौभाग्य सूचक के रूप में माँग में सिंदूर भरा जाता है। यह सिंदूर माथे से लगाना आरंभ करके और जितनी लंबी मांग हो उतना भरा जाने का प्रावधान है।



यह सिंदूर केवल सौभाग्य का ही सूचक नहीं है इसके पीछे जो वैज्ञानिक धारणा है कि वह यह है कि माथे और मस्तिष्क के चक्रों को सक्रिय बनाए रखा जाए जिससे कि ना केवल मानसिक शांति बनी रहे बल्कि सामंजस्य की भावना भी बराबर बलवती बनी रहे अत: शादी में मांग भरने की रस्म इसीलिए निभाए जाती है ताकि वैवाहिक जीवन में हमेशा प्रेम व सामंजस्य बना रहे।

नई दुल्हन को शादी में गहने क्यों दिए जाते है?

हिन्दू परंपरा के अनुसार बेटियों की शादी में उसके मायके वालों की ओर से अनेक उपहार विवाह के उपलक्ष्य में बेटी को दिए जाते हैं। माता-पिता का यही सपना होता है कि उनकी बेटी ससुराल में हमेशा खुश रहे। उसे कभी किसी तरह की कोई कमी महसूस न हो। नववधु को माता-पिता की ओर से आभुषण दिए जाने का एक मुख्य कारण यह है कि उनकी बिटिया को जिंदगी में कभी भी अभाव का सामना ना करना पड़े। साथ ही इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है।

पहले जब वधू को कमरधनी (तगड़ी) पहनाई जाती थी और गले में भारी हार पहनाए जाते थे और भारी-भारी पायल भी पहनाई जाती थी तो उसके पीछे तथ्य शारीरिक स्वास्थ्य को बनाए रखना था। ये विशेष आभूषण भारी होने से एक्युप्रेशर के पाईन्ट को दबाए रखने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं और पायल रिप्रोडेक्टिव ऑर्गन को भी ठीक रखती है। यही कारण है कि आभूषण केवल स्त्रियाँ ही नहीं पहनती थीं बल्कि पुरूष भी बड़े और भारी आभूषण धारण किया करते थे। आज भारी आभूषणों की जगह हल्के और सुंदर आभूषणों ने ले ली है और इन सबके पीछे काल और परिस्थिति का बदल जाना है।

Hindi Quotes....

Friday, March 25, 2011

* वही सबसे तेज चलता है, जो अकेला चलता है।
* प्रत्येक अच्छा कार्य पहले असम्भव नजर आता है।
* ऊद्यम ही सफलता की कुंजी है।
* एकाग्रता से ही विजय मिलती है।
* कीर्ति वीरोचित कार्यो की सुगन्ध है।
* भाग्य साहसी का साथ देता है।
* सफलता अत्यधिक परिश्रम चाहती है।
* विवेक बहादुरी का उत्तम अंश है।
* कार्य उद्यम से सिद्ध होते है, मनोरथो से नही।
* संकल्प ही मनुष्य का बल है।
* प्रचंड वायु मे भी पहाड विचलित नही होते।
* कर्म करने मे ही अधिकार है, फल मे नही।
* मेहनत, हिम्मत और लगन से कल्पना साकार होती है।
* अपने शक्तियो पर भरोसा करने वाला कभी असफल नही होता।


* मुस्कान प्रेम की भाषा है।
* सच्चा प्रेम दुर्लभ है, सच्ची मित्रता और भी दुर्लभ है।
* अहंकार छोडे बिना सच्चा प्रेम नही किया जा सकता।
* प्रसन्नता स्वास्थ्य देती है, विषाद रोग देते है।
* प्रसन्न करने का उपाय है, स्वयं प्रसन्न रहना।
* अधिकार जताने से अधिकार सिद्ध नही होता।
* एक गुण समस्त दोषो को ढक लेता है।
* दूसरो से प्रेम करना अपने आप से प्रेम करना है।


* समय महान चिकित्सक है।
* समय किसी की प्रतीक्षा नही करता।
* हर दिन वर्ष का सर्वोत्तम दिन है।
* एक झूठ छिपाने के लिये दस झूठ बोलने पडते है।
* प्रकृति के सब काम धीरे-धीरे होते है।


* बिना गुरु के ज्ञान नही होता।
* आपकी बुद्धि ही आपका गुरु है।
* जिग्यासा के बिना ज्ञान नही होता।
* बिना अनुभव के कोरा शाब्दिक ज्ञान अंधा है।
* अल्प ज्ञान खतरनाक होता है।
* कर्म सरल है, विचार कठिन।
* उपदेश देना सरल है, उपाय बताना कठिन।


* धन अपना पराया नही देखता।
* जैसा अन्न, वैसा मन।
* अहिंसा सर्वोत्तम धर्म है।
* बहुमत की आवाज न्याय का द्योतक नही है।
* अन्याय मे सहयोग देना, अन्याय के ही समान है।
* विश्वास से आश्चर्य-जनक प्रोत्साहन मिलता है।

जागरण का वैज्ञानिक महत्व

Thursday, February 17, 2011

जितनी भी रात्रियां जागरण के लिए श्रेष्ठ मानी गई उनमें, नवरात्रि को छोड़कर सभी पूर्णिमा, अमावस्या एवं एकादशी तिथि को पड़ती है। यह बड़े महत्वपूर्ण दिन होते हैं। इनमें चंद्रमा और सूर्य एक विशेष कोण पर उपस्थित होते हैं। जो व्यक्ति के मन और बुद्धि पर प्रभाव डालते हैं। सोते समय बुद्धि सुप्त होती है। अर्थात् ग्रहों का प्रभाव इन पर आसानी से होता है। परंतु जागते रहने से सचेत बुद्धि दिमाग होता है। अत: सूर्य, चंद्र का प्रभाव इस पर नहीं पड़ता। इन दिनों में उपवास भी करना चाहिए।